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चीन का इतिहास

चीन-का-इतिहास
चीन का नक्शा

आज जिस चीन को हम देख रहें हैं, इतिहास में वह कभी ऐसा न था। इसके पीछे एक बहुत बड़ी ऐतिहासिक नियतावाद की कहानी छिपी हुई है, जिसके चलते चाइना ने उदारवाद से साम्रज्यवाद की ओर पलायन किया। आइए जानतें हैं-

भारत और चीन की सभ्यता को विश्व की पुरातन सभ्यताओं में एक गिना जाता है। ऐतिहासिक कालक्रम में भारत के दर्शन का वृहत्तर प्रभाव चीन पर पड़ा। इस कारण चीन में लाओत्सु और कन्फ्यूसियस जैसे महापुरुषों हुए। ये दोनों महापुरुष बुद्ध और महावीर के समकालीन थे। दोनों महान सन्तों के दर्शन की बुनियाद भारत की आध्यात्मिक पृष्ठभूमि पर ही हुई। इसके अलावा भारत के महान शाशक अशोक की पुत्री संघमित्रा ने चीन में जाकर बुद्ध धर्म का प्रचार किया। इस दौरान आध्यात्मिकता के प्रभाव में आकर चीन में लाखों लोगों ने बुद्ध धर्म को अपनाया। चीन और भारत का एक बहुत बड़ा सांस्कृतिक जुड़ाव हो चुका था। इस कारण चीन से हज़ारों छात्र नालंदा विश्विद्यालय में आकर शिक्षा लेने लगे। इस बड़े सांस्कृतिक जुड़ाव के चलते दोनों देशों की वास्तुकला में एक नया गठजोड़ देखने को मिला।

हमारे और चीन के बीच सांस्कृतिक जुड़ाव के साथ साथ एक बहुत बड़ा आर्थिक जुड़ाव भी था। दोनों ही देश रेशममार्ग से व्यापार करते थे। इस मार्ग के चलते भारत, चीन, मिस्र, ईरान, अरब और रोम की पुरानी सभ्यताओं के विकाश पर गहरा असर पड़ा। रेशम मार्ग की मदद से चीन भारत में चाय, चीनी मिट्टी के बर्तन और रेशम भेजता था। वहीं भारत चीन को मसाला, हाथीदांत, कपड़े और काली मिर्च का निर्यात करता था।

आधुनिक चीन पर गौर करें तो इसकी शुरुवात 1911 की क्रांति से होती है। सन यात सेन की अगुवाई में इस क्रांति का फलन यह निकलता है कि चिंग राजवंश की समाप्ति होती है और चीन में गणतंत्र का उद्भव होता है। यह एक बहुत बड़ी घटना थी। चीन एशिया का सबसे पहला देश बना जहाँ गणतंत्र की स्थापना हुई। इसके बाद सन 1937 में जपान चीन के नानजिंग शहर पर हमला बोल देता है। लाखों की संख्या में नरसंहार होता है। हज़ारों महिलाओं का बलात्कार जपानी सेना चीन में करती है। इस दौरान जपान चीन के अधिकांश इलाकों पर कब्जा कर लेता है। एक तरफ जहां च्यांग काई शेक को जपान से लड़ना पड़ रहा था। वहीं दूसरी ओर चीन के कम्युनिस्टों ने भी उनकी नाक में दम मचा कर रखा था। देश में जहाँ एक तरफ सरकार युद्ध में लगी हुई थी। वहीं दूसरे ओर माओत्सेतुंग जनता का सरकार के प्रति असंतोष बढ़ा रहा था। यह युद्ध 1945 तक चलता है। इसी समय अमेरिकी सेना जापान पर परमाणु हमला करती है। परमाणु हमले से लकवाग्रस्त होकर जापान आत्मसमर्पण कर देता है। इसके चलते चीन और जपान का युद्ध खत्म हो जाता है।

चीन गरीबी और भ्रस्टाचार के चंगुल में फसा हुआ था। लोगों का सरकार के प्रति असंतोष बढ़ रहा था, जिसका फायदा माओत्से तुंग ने उठाया। वह धीरे धीरे जगह जगह जाकर कॉम्युनिज्म का प्रचार करने लगा। माओत्से तुंग किताबो के माध्यम से अपने विचार अब चीन में फैला रहा था। वह घर घर जाकर किसानों से मिलता और उन्हें अपनी आइडियोलॉजी से प्रभावित करता। इससे लोगों का सरकार के प्रति अविश्वाश और भी ज्यादा बढ़ गया था। एक भारी झुकाव चीन के किसानों और गरीब तबके का वामपंथ और माओत्से तुंग के प्रति हो चुका था।

जैसा कि मैंने पहले ही इस बात का जिक्र किया कि द्वितीय विश्वयुद्ध के समाप्त होते ही जपान आत्मसमर्पण कर देता है। इसके चलते चीन में जिस जगह पर जापानी सेना तैनात थी उस पर सीधा नियंत्रण सोवियत सेना को मिल गया। जपानी सैनिकों से जो भारी मात्रा में हथियार मिला। सोवियत आर्मी ने उसे चीन में कम्युनिज्म फैलाने के उद्देश्य से इस्तेमाल किया, ताकि कम्युनिज्म और भी ज्यादा मजबूत हो सके। देखते ही देखते लगभग तीन साल में सोवियत सरकार की मदद से माओत्से तुंग ने पूरे चीन पर नियंत्रण कर लिया। इसके चलते च्यांग काई शेक और उसके पार्टी के लोगों को मजबूरन ताइवान भागना पड़ा। यहीं से आज के चीन की शुरुवात होती है।



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