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क्यों दक्षिणी चीन सागर को लेकर उत्सुक है चाइना?


लंबे समय से साउथ चाइना सी के क्षेत्र पर चीन अपना अधिकार जताता रहा है। चीन का यह दावा कितना सही है और कितना गलत आइए जानते हैं -


क्या है साउथ चाइना सी मतभेद?


साउथ चाइना सी चाइना, ताइवान, फिलीपींस, ब्रुनेई, मलेसिया और वियतनाम इन देशों के मध्य है। इसी साउथ चाइना सी के मध्य में दो द्वीप हैं पारासेल और स्प्रेटले। जो कि चाइना के समुद्री अधिकार क्षेत्र (तटवर्ती देशों का समुद्री अधिकार क्षेत्र 200 नॉटिकल मील होता है) से काफी दूर हैं। आपको बता दें कि चाइना इन द्वीपों पर लंबे वक़्त से कब्जा करने की कोशिश में लगा हुआ है। वहीं दूसरी ओर पारासेल और स्प्रेटले द्वीप समूह पर वियतनाम, ब्रुनेई, मलेसिया, फिलीपींस भी अपने अधिकार का दावा लंबे समय से कर रहें हैं। इन देशों के मध्य जो द्वीप को लेकर लड़ाई है। वह ज्यादा बड़ी नहीं है। ये लड़ाई द्वीपों के कुछ खास क्षेत्रों को लेकर है। वहीं दूसरी ओर चाइना का कहना है कि यह दोनों द्वीप समूह उसका है।

चाइना अगर इन दोनों द्वीपों पर कब्जा कर लेता है तो उसके सहारे उसका समुद्री अधिकार क्षेत्र पूरे साउथ चाइना सी पर हो जाएगा। अर्थात चाइना की मंशा द्वीपों के सहारे पूरे साउथ चाइना सी को कब्जाने की है पर चाइना ऐसा कर नहीं पा रहा है। इस कारण उसने 2014 में पारासेल द्वीप के पास एक आर्टिफीसियल द्वीप बना दिया। फिलीपीन्स ने चाइना के इस गैराधिकारिक दावे को लेकर इंटरनेशनल ट्रिब्यून में केस किया। 2016 में इंटरनेशनल ट्रिब्यून ने इसे लेकर अपना फैसला सुनाया जो कि चाइना के खिलाफ था। चाइना ने इंटरनेशनल ट्रिब्यून के फैसले को मानने से इंकार कर दिया। जवाब में उसने कहा कि 1947 के नक्से के अनुसार साउथ चाइना सी पर उसका हक़ है। चाइना ने जिस आधार पर यह बात रखी वह पूरी तरह बेतुकी थी।

चाइना अक्सर साउथ ईस्ट देशों को तंग करता रहता है। हाल ही में अप्रैल 2020 में जब वियतनाम की एक शिप कुछ आर्थिक गतिविधि के लिए साउथ चाइना सी में गयी तो चाइना ने उसे मिसाइल हमले से डुबा दिया। गौरतलब बात है कि शिप अपने अधिकार क्षेत्र में ही थी। चीन का यह नजायज हक़ लंबे समय से साउथ ईस्ट देशों को तंग करता आ रहा है।


साउथ चाइना सी पर चाइना का इतना झुकाव क्यों है?


सामरिक, कूटनीतिक, सुरक्षा और आर्थिक चारो नजरिये से साउथ चाइना सी चाइना के लिए हितकर है। यही एक कारण है, जिसके चलते चाइना लंबे समय से साउथ चाइना सी पर आंख गड़ाए टिक्का है। आइए जानते हैं कि साउथ चाइना के पीछे चीन के आकर्षण की खास वजह क्या क्या हैं -

1 साउथ चाइना सी का क्षेत्र 36 लाख वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ है। अगर चाइना का इस क्षेत्र पर अधिकार हो जाता है तो वह यहां से वह बड़ी आर्थिक गतिविधियों को प्रभावित कर सकता है। दुनिया का 30 प्रतिशत व्यापार साउथ चाइना सी के जरिये होता है। यानी 3 ट्रिलियन डॉलर का व्यापार साउथ चाइना सी के रास्ते होता है। ऐसे में उस पर चाइना का नियंत्रण हो जाएगा। दक्षिणी चीन सागर के रास्ते से आने जाने वाली समस्त व्यापारिक नौकाओं को चाइना को टैक्स देना होगा।

2 आपको जानकर हैरानी होगी, साऊथ चाइना सी के भीतर 11 बिलियन बैरल पेट्रोल का खजाना है। और यह अनुमानित है इससे भी ज्यादा पेट्रोल इस समुद्र में हो सकता है। इससे चाइना को आने वाले 70 से 80 सालों के दौरान पेट्रोलियम की कभी भी दिक्कत नहीं आएगी।

3 साउथ चाइना सी में 266 ट्रिलियन क्यूबिक फीट के नेचुरल गैस का बहुत बड़ा भंडार है।

4 दुनिया का 10 प्रतिशत मत्स्य उत्पादन साउथ चाइना सी में होता है।

इसी के चलते चाइना दक्षिण चीन सागर से पीछे हटने के लिए तैयार नहीं हो रहा है।


भारत और साउथ चाइना सी


भारत और चाइना के रिश्ते कभी ठीक नहीं रहे। लंबे समय से हमें चाइना तंग करता आ रहा है। कभी अवैध रूप से हमारी जगह को अपना बताना तो कभी अंतरराष्ट्रीय मंचों पर हमारा विरोध करना। चाइना ने हमेशा से ही भारत के प्रति कटुतापूर्ण रवैया अपनाया है। ऐसे में हमने गलवान वैली में हुई घटना के बाद से चाइना से अपने आपसी रिश्ते बहुत हद तक कम कर दिए हैं।
अंतरराष्ट्रीय मंचों पर हम चाइना को कई मुद्दों पर घेर सकतें हैं। इसमें सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा दक्षिणी चीन सागर बन सकता है। इसके अलावा प्रत्यक्ष रूप से अब हमें साउथ ईस्ट देशों की मदद करनी चाहिए। चाणक्य नीति कहती है, दुश्मन का दुश्मन दोस्त होता है। ऐसे में हमें वियतनाम और अन्य साउथ ईस्ट देशों को ब्रह्मोस जैसे हथियार सप्लाई करना चाहिए। इंद्र कुमार गुजराल के समय भारत को दक्षिण पूर्वी देशों से जोड़ने के लिए लुक ईस्ट नीति की शुरुवात की गयी थी। अब वक़्त आ गया है उसे पहले से ज्यादा शशक्त ढंग से चलाने का।

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