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ब्लैक होल (कृष्ण विविर)

ब्लैक-होल
ब्लैक होल

कृष्ण विविर यानी कि ब्लैक होल, इस जगत की सबसे बड़ी अबूझ पहेलियों में से एक है। ब्लैक होल ज्यादा पुराना विषय नहीं है। कुछ दशक पहले ही इसका सिद्धान्त सामने आया था। आते ही इसने न केवल वैज्ञानिकों को ब्रह्मांड समझने में एक अलग आयाम दिया साथ ही अंतरिक्ष विज्ञान में नए रहस्यों को भी उजागर किया। 

आखिर क्या होते हैं ये ब्लैक होल्स? ब्रह्मांड में इनकी उत्पत्ति कैसे होती है? अंतरिक्ष को ये कैसे प्रभावित करते हैं? क्या ब्लैक होल्स के जरिये समय यात्रा की जा सकती है? आइए जानते हैं - 


क्या होते हैं ब्लैक होल्स?

ब्लैक होल्स अब तक के ज्ञात ब्रह्मांड में सबसे रहस्यमयी विषयों में से एक है। ब्लैक होल्स, ब्रह्मांड के सबसे सघन ऑब्जेक्ट हैं। इनका ग्रेविटेशनल खिंचाव इतना अधिक होता है कि इसमे से लाइट भी पार नहीं निकल सकती है।

1917 में अल्बर्ट आइंस्टीन ने क्रांतिकारी सिद्धान्त "द थ्योरी ऑफ रिलेटिविटी" दिया। इसमें उन्होंने बताया कि समय और स्पेस एक दूसरे से जुड़े हुए हैं। वे दोनों एक चादर की भांति पूरे ब्रह्मांड में फैले हैं। गुरुत्वाकर्षण बल, समय और स्पेस की इस चादर को वक्रनुमा आकार में मोड़ता है। जिसके चलते सभी ग्रह अपने तारे की परिक्रमा करते हैं और सभी तारे अपनी आकाशगंगा के केंद्र की परिक्रमा करते हैं। इसी सिद्धान्त पर पूरा ब्रह्मांड कार्य करता है। आइए इसे थोड़ा विस्तार से समझते हैं- 

हमारे सौर मंडल में सूर्य के गुरुत्वाकर्षण बल के चलते स्पेस और टाइम का आकार वक्रनुमा हो जाता है। इस कारण पृथ्वी और बाकी ग्रह, सूर्य की परिक्रमा करते हैं। यही प्रक्रिया हमारे सूर्य और बाकी तारों के साथ भी लागू होती है। अल्बर्ट आइंस्टीन ने यह कल्पना की थी कि हो न हो हमारी गैलेक्सी के केंद्र में एक ऐसा मास ऑब्जेक्ट जरूर होगा जिसका गरुत्वाकर्षण बल बहुत ज्यादा हो। और इसके चलते सभी तारे उस केंद्र की परिक्रमा कर रहें हैं। इस सिद्धान्त को आप नीचे दी गयी तस्वीर को देख कर समझ सकते हैं।
ब्लैक-होल,समय-और-स्पेश
समय और स्पेश

थ्योरी ऑफ रिलेटिविटी दिए जाने के 50 साल बाद यानी कि 1967 में अमरीकी एस्ट्रोनॉमर जॉन व्हीलर ने एक नए टर्म को उछाला। यह टर्म  था "ब्लैक होल"। ब्लैक होल लंबे समय तक एक सिद्धान्त के रूप में ही रहा। 1971 में जाकर सर्वप्रथम ब्लैक होल का पता चला।  इसको ग्रेविटेशनल वेब के जरिये स्पॉट किया गया। इस खोज से यह प्रमाणित हुआ कि आइंस्टीन ने जो कल्पना की थी वह सही थी। 

पिछले साल 2019 में सर्वप्रथम ब्लैक होल की इमेज खगोलविदों को मिली। इस इमेज को इवेंट होरिजन टेलिस्कोप से लिया गया। यह एक बहुत बड़ी उपलब्धि थी। आने वाले समय में इस तस्वीर की मदद से हमारे वैज्ञानिक ब्लैक होल को और भी ज्यादा सटीक ढंग से समझ पाएंगे।


ब्लैक होल्स कैसे बनते हैं?

ब्लैक होल का निर्माण तारों की मृत्यु या कहें सुपरनोवा होने के बाद होता है। एक समय ऐसा आता है जब तारों के भीतर फ्यूज़न की क्रिया बंद हो जाती है। इस कारण तारों का कोर अपने अंदर ही सिकुड़ने लगता है। कम समय के भीतर ही वह भारी मात्रा में गैसों को अपने भीतर खींचता है। इसके चलते तारा के भीतर एक बहुत भयानक विस्फोट (सुपरनोवा) होता है। इस विस्फोट में इतनी ऊर्जा होती है कि हमारा सूर्य अपने पूरे जीवनकाल में इतनी ऊर्जा उत्सर्जित नहीं कर सकता।

इस विस्फोट के बाद ब्लैक होल अस्तित्व में आता है। इसकी गुरुत्वाकर्षण क्षमता इतनी अधिक होती है कि उसमे से लाइट भी बच कर नहीं निकल सकती। हमारी पृथ्वी को अगर स्क्वार्ज़ चाइल्ड रेडियस तक छोटा कर दिया जाए। यानी कि एक मटर के दाने के बराबर तो वह भी एक ब्लैक होल के रूप में परिवर्तित हो जाएगी।


ब्लैक होल की खोज किसने की थी?

ब्लैक होल की खोज कार्ल स्क्वार्जस्चिल्ड और जॉन व्हीलर ने की थी। गौरतलब बात यह है कि 1967 में जॉन व्हीलर ने ब्लैक होल टर्म को उछाला था। 1971 में इसके पुख्ता सबूत खगोलविदों को मिले थे।


ब्लैक होल और टाइम ट्रेवल

अल्बर्ट आइंस्टीन द्वारा दिए गए सापेक्षतावाद के सिद्धान्त के मुताबिक इस ब्रह्मांड में हर जगह समय एक जैसा नहीं है। बल्कि वह सापेक्ष है। वह इस सम्पूर्ण ब्रह्मांड में हर जगह अलग अलग है। ऐसा क्यों है? इसका कारण है। ग्रेविटी के प्रभाव में आकर समय धीमा गुजरता है। अर्थात जहां ज्यादा ग्रेविटी का खीचाव है वहां समय धीमा गुजरेगा। इस कारण ब्लैक होल्स के करीब समय की गति धीमी चलती है।

हम ब्लैक होल्स के जरिये समय यात्रा कर सकते हैं। वहां ग्रेविटी का प्रभाव ज्यादा है। अगर हम ब्लैक होल के पास किसी एक प्लेनेट पर एक साल बिताते हैं तो वह एक साल पृथ्वी के 10 साल के बराबर होगा। अगर आप किसी ब्लैक होल के नजदीक एक प्लेनेट पर जाकर 1 साल बिताकर आएंगे तब तक यहां पृथ्वी पर दस साल गुजर चुके होंगे। यह सैद्धान्तिक स्तर पर प्रमाणित बात है। गौरतलब बात है कि हम पर अभी इतने उपयुक्त साधनों की उपलब्धता नहीं हुई है कि इस प्रक्रिया को अंजाम दिया जा सके। इस सिद्धान्त के मुताबिक समय में केवल आगे जाया जा सकता है। अर्थात समय एक रेखीय है। 

इसी सिद्धान्त पर क्रिस्टोफर नोलन की एक शानदार फ़िल्म "इंट्रस्टीलर" बनी है। कभी खाली समय मिले तो इस फ़िल्म को जरूर देखना।

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