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क्या है इजराइल और फिलिस्तीन का विवाद?

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इजराइली झंडा

इजराइल और फिलिस्तीन दो ऐसे देश हैं जिनका विवाद काफी लंबे समय से चला आ रहा है। दोनों देशों के बीच शांति स्थापित करने और मतभेद को खत्म करने के लिए कई बार समझौते हुए पर निष्कर्ष कुछ खास नहीं निकला। आज हम जानेंगे कि इस विवाद की जड़ क्या है? इसकी शुरुवात कहाँ से हुई? वह कौन कौन से मुद्दे थे? जिन्होंने इस मतभेद को और भी ज्यादा बढाया। आइए जानते हैं-

इतिहास


इजराइल और फिलिस्तीन के बीच के मतभेद की शुरूआत ऑटोमन सम्राज्य के खत्म होने का साथ होती है। इस दौरान पूरे युरोप में राष्ट्रवाद का व्यापक प्रभाव देखा जा रहा था। कई देश टुकड़ों टुकड़ों में बटे थे। राष्ट्रवाद की लहर इन्हें एक कर रही थी। इटली और जर्मनी इसके प्रमुख उदाहरण हैं।

इसका प्रभाव यहूदियों के बीच भी देखने को मिला। राष्ट्रवाद की भावना यहूदी लोगों के बीच जगी। उन्हें अपने पवित्र स्थान पर दोबारा जाकर बसने की लालसा उठी। यहीं से जियोनिष्ट आंदोलन की शुरूआत होती है। उन्नीसवीं शताब्दी में यहूदियों की यह पवित्र भूमि फिलिस्तीन के नाम से जानी जाती थी। इस दौरान पूरे युरोप में यहूदी बिखरे हुए थे। उनके साथ यूरोप में काफी शोषण होता आया था। जियोनिष्ट आंदोलन के अंतर्गत शुरूआत में छोटे स्तर पर यहूदियों का पलायन फिलिस्तीन की ओर हुआ। इसके बाद आता है प्रथम विश्व युद्ध का दौरा। 1917 में बेलफोर डिक्लेरेशन आता है। कई लोगों का मानना है कि बेलफोर डिक्लेरेशन ही वह प्रमुख वजह थी, जिसने इजराइल और फिलिस्तीन मतभेद को जन्म दिया।

बेलफोर डिक्लेरेशन


1917 में प्रथम विश्व युद्ध के दौरान जब ऑटोमन इम्पायर हारने की कगार पर था। उस वक्त ब्रिटेन के विदेश मंत्री सर आर्थर बेलफोर ने एक डिक्लेरेशन जारी किया। इस डिक्लेरेशन में यह इंगित किया गया कि ब्रिटेन, यहूदियों को उनकी पवित्र भूमि फिलिस्तीन देगा और वहां उनका पुनर्वास करवाएगा।
वहीं दूसरी ओर ब्रिटन ने चुपके से फ्रांस और रूस के साथ साइक्स-पिकोट (SYKES=PICOT) एग्रीमेंट पर हस्ताक्षर किया। इसके अंतर्गत उसने पूरे मध्यपूर्व को अलग-अलग हिस्सों में बांट दिया और तय किया कि प्रथम विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद कौन सा देश किस के हिस्से में जाएगा। इसमें उसने फिलिस्तीन को अपने हिस्से में रखा। सीरिया और जॉर्डन फ्रांस को दिया गया। वहीं तुर्कि का कुछ हिस्सा रूस के पास गया। एक तरफ ब्रिटेन ने सामूहिक तौर पर यह कहा कि फिलिस्तीन हम यहूदियों को देंगे। वहीं दूसरी ओर उसने गुपचुप तरीके से साइक्स-पीको एग्रीमेंट के तहत यह हिस्सा अपने पास रख लिया।

प्रथम विश्व युद्ध खत्म होने के बाद


ऑटोमन साम्राज्य की हार हो चुकि थी। फिलिस्तीन में ब्रिटिश शासनादेश की शुरूआत होती है। बेलफोर डिक्लेरेशन के चलते भारी मात्रा में यहूदियों का पलायन फिलिस्तीन में हो चुका था। इस दौरान यहूदियों की तदाद तेजी से बढ़ रही थी। फिलिस्तीन में जो यहूदी पलायन कर के आ रहे थे। उन्होंने यहां आकर जमीने खरीदनी शुरू करी। धीरे धीरे यहूदियों का फिलिस्तीन में विस्तार होने लगा। अब यहूदियों ने अरब फिलिस्तीनीयों से जमीने खरीदने की दर पहले के मुकाबले और भी ज्यादा बढ़ा दी। यहूदियों का फिलिस्तीन में अब व्यापक विस्तार होने लगा था। इसके बाद उन्होंने अरब फिलिस्तीनियों को भगाना शुरू किया। इसके चलते 1936 में अरब फिलिस्तीनियों ने विद्रोह कर दिया। इसे दबाने के लिए ब्रिटिश सरकार ने यहूदी सेना की मदद ली। बाद में अरब फिलिस्तीनियों को शांत करने के लिए ब्रिटिश सरकार ने यहुदी माइग्रेसन पर कई तरह की पाबंदियां लगा दी। इसके चलते यहूदी लोग ब्रिटिश सरकार के खिलाफ हो गए और छुप छुप कर छोटे स्तर पर गुरिल्ला हमला उन पर करने लगे।

 द्वितीय विश्व युद्ध


इसके बाद द्वितीय विश्व युद्ध की शुरूआत होती है। हिटलर के शासन के अंतर्गत पूरे युरोप में भयंकर स्तर पर यहूदियों का नरसंहार हुआ। करीबन 42 लाख यहूदियों को गैस चैंबर में डालकर मार दिया गया। युरोप में रह रहे यहूदियों को महसूस हुआ कि फिलिस्तीन के अलावा कहीं कोई दूसरी जगह नहीं, जहां यहूदी सुरक्षित रह सकें।

इजराइल देश का उद्भव

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद संयुक्त राष्ट्र संघ अस्तित्व में आता है। उधर दूसरी तरफ यहूदी और अरब लोगों के बीच का मतभेद काफी ज्यादा बढ़ गया था। ब्रिटेन इस मसले को हल करने में सक्षम नहीं थाइसलिए उसने यह मसला संयुक्त राष्ट्र संघ में भेज दिया। इस मसले पर संयुक्त राष्ट्र संघ में वोटिंग होती है। नतीजा निकलता है, जहां यहूदियों की संख्या ज्यादा है उन्हें इजराइल दिया जाएगा। जहां अरब बहुसंख्यक हैं, उन्हें फिलिस्तीन दिया जाएगा। तीसरा था जेरूसलम, इसे लेकर काफी मतभेद थे। यहां आधी आबादी यहूदी थी और आधी आबादी मुस्लिम। इसे लेकर संयुक्त राष्ट्र संघ ने अपने फैसले में कहा कि इस क्षेत्र पर अंतरराष्ट्रीय नियंत्रण लागू होगा।

अरब इजराइल युद्ध 1948-49


यु,एन के इस फैसले के फौरन बाद ही नवनिर्मित इजराइल के पड़ोसी देशों (इजिप्ट, सीरिया, इराक और जॉर्डन) ने उस पर हमला बोल दिया। इस युद्ध में इजराइल ने अपना बचाव करते हुए, इन चारों देशों को हरा दिया। इस लड़ाइ के बाद जॉर्डन के पास फिलिस्तीन के पूरे वेस्ट बैंक का नियंत्रण आ गया। वहीं गाजा पट्टी पर इजिप्ट का। जो थोड़ी बहुत जगह फिलिस्तीन की बच्ची थी, उस पर इजराइल ने कब्जा कर लिया। इस युद्ध के चलते फिलिस्तीन का अस्तित्व न के बराबर हो गया। युद्ध में इजराइल ने फिलिस्तीन के पचास फीसदी हिस्सों पर कब्जा कर लिया था। इस युद्ध के चलते लगभग सात लाख अरब फिलिस्तीनियों को बतौर शरणार्थी अपना देश छोडना पड़ा।          
      

1967 का युद्ध


अरब इजराइल युद्ध के बाद इजिप्ट, सीरीया और जॉर्डन ने 1967 में फिर से इजराइल पर हमला करने की योजना बनाते हैं। उनके इस हमले से पहले ही इजराइल इन तीनों देशों पर हमला बोल देता है। हमले में तीनों देशों को काफी नुकसान पहुंचता है। इस युद्ध में इजराइल ने सीरीया से गोलन हाइट, इजिप्ट से गाजा स्ट्रिप एवं सिनाई पेनीसुला और जॉर्डन से वेस्ट बैंक छीन लिया। बाद में कुछ अंतरराष्ट्रीय समझौतों के चलते इजराइल को सिनाई पेनीसुला इजिप्ट को वापस करना पड़ा। उधर दूसरी ओर इजराइल के पास पूरा फिलिस्तीन कब्जे में था। इस युद्ध को सिक्स डे वार के नाम से जाना जाता है।

ओसलो एकोर्ड समझौता 1993


इजराइल का फिलिस्तीन पर पूरा नियंत्रण हो चुका था। इसके बाद फिलिस्तीनी लोग वेस्ट बैंक पर बढ़ रहे इजराइली सैन्यकरण, दमनकारी नीतियों के खिलाफ बोलना शुरू करते हैं। इसी कड़ी में यासेर आराफात ने एक संगठन की शुरूआत की, जिसका नाम फिलिस्तीन लिबरेशन ऑर्गनाइजेशन था। इस संगठन ने कई छुटमुट बमबारी करी, विदेशों में स्थापित इजराइली अम्बेसी पर हमला किया। इजराइल के कई विमान हाइजेक किए गए। इस दौरान इजराइल में हिंसा बढ़ने लगी थी। 
   
तत्पश्चात एक बहुत बड़ा परिवर्तनकारी दौर आता है। दोनों देशों के बीच शांति स्थापित करने के लिए 1993 में ओसलो एकोर्ड समझौता होता है। इसमें यह निर्णय लिया गया कि फिलिस्तीन, इजराइल को एक अंतरराष्ट्रीय देश के रूप में स्वीकार करेगा। वहीं दूसरी ओर इजराइल ने पी.एल.ओ को फिलिस्तीनी लोगों का प्रतिनिधी माना। इस समझौते में यह भी निर्णय लिया गया कि फिलिस्तीन सरकार वेस्ट बैंक और गाजा स्ट्रिप को लोकतांत्रिक ढंग से नियंत्रित करेगी। इस समझौते के लिए इजराइल के यिट्ज स्टाक राबेन और फिलिस्तीन के यासेर आराफात को शांति का नोबेल पुरूस्कार दिया गया था। गौरतलब बात यह है कि समझौता पांच साल के लिए किया गया था। इसके बाद दोबारा शांति समझौते के लिए कैम्प डेविड-II, 2000 में इजराइल और फिलिस्तीन एक मंच पर आए। दोनों देशों के बीच इस समझौते में कोई खास सहमति नहीं बन पाई। इसके चलते यह शांति समझौता टूट गया। तब से लेकर आज तक दोनों देशो के बीच किसी मुद्दे पर सहमति नहीं बन पाई है।

दोनों देशों के बीच दोबारा मतभेदों की शुरूआत तब होती है जब कैम्प डेविड समझौते के फौरन बाद इजराइली राष्ट्रपति एहूद बराक फिलिस्तीनी सीमा में 1000 सैनिकों के साथ टेम्पल माउंट पर जाते हैं।इसके चलते फिलिस्तीनी लोगों का गुस्सा फिर से फूट पड़ता। इसके बाद दोबारा हिंसक झड़पो की शुरुवात होती है। यह हिंसक गतिविधियां पहले के मुकाबले ज्यादा उग्र थी। इसमें 1000 यहूदियों की जानें गई तो वहीं 3200 फिलिस्तीनियों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा। ये घटना क्रम सन 2000 से लेकर 2005 तक चलता रहा। इसके बाद 2005 में इजराइल ने अपनी नीतियों में कई बड़े बदलाव किए। उसने गाजा से अपने 8000 हजार सैनिको को हटा दिया।

हमास का उत्थान


फिलिस्तीन में हमास (वर्तमान परिप्रेक्ष्य में इसे आतंकवादी संगठन की संज्ञा दी जाती है) राजनीतिक पार्टी का गाजा में उद्भव होता है। वहीं दूसरी ओर पी,एल,ओ से जुड़ी पार्टी फतह, हमस को सरकार में लेने से मना कर देती है। इसके बाद 2007 में हमास का पूरी तरह गाजा पर नियंत्रण हो जाता है। इस कारण फतह को वहां से जाना पड़ता है। हमास के उत्थान से फिलिस्तीन की राजनीति में दोहरीकरण आता है। पहले केवल एक ही पार्टी (PLO) थी। फिलिस्तीन के इन दोनों पार्टियों की विचारधारा एक दूसरे से पूरी तरह भिन्न है। इस कारण दोनों देशों के बीच के मतभेद और भी ज्यादा बढ गए हैं।

हमास गाजा पट्टी में राइटविंग विचारधारात्मक पार्टी है। उग्र राष्ट्रवाद के नशे में हमस गाजा पट्टी से इजराइल पर खतरनाक रॉकेटों से हमले करता रहता है। इस हमले में इजराइल के कई नागरिकों की जानें चली गई हैं। इस कारण इजराइल ने गाजा को पूरी तरह से लाक कर रखा है। इजराइल का यह भी कहना है कि इरान जैसे देश गाजा में हथियारों की सप्लाई करते हैं, ताकि हमारे देश की अखंडता को तोड़ा जा सके। इस ब्लॉकेड के चलते गाजा के हालात दिनों-दिन खराब होते जा रहें हैं। बेराजगारी दर 40 फीसदी से भी ऊपर पहुंच चुकी है। बिजली-पानी की समस्या काफी ज्यादा है। यही स्थिति आज भी है। हाल ही में अमेरिका ने इजराइल और फिलिस्तीन के विवाद को सुलझाने के लिए पीस प्लान लेकर आया था। इसे फिलिस्तीन ने अस्वीकार कर दिया।


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