Ticker

6/recent/ticker-posts

दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन (सार्क)

दक्षिण-एशिया-क्षेत्रीय-सहयोग-संगठन
सार्क देश

दक्षिण एशिया क्षेत्रीय सहयोग संगठन की स्थापना 8 दिसंबर, 1985 में बांग्लादेश की राजधानी ढ़ाका में हुई। यह संगठन दक्षिण एशियाई राज्यो का एक संगठन है। इसका प्रमुख उद्देश्य आपसी सहयोग, सौहार्दपूर्ण व आर्थिक उन्नति को बढ़ावा देना है। आजादी के बाद से इन दक्षिण एशियाई देशों को काफ़ी समस्याओ का सामना करना पड़ा। इन देशों के पास सीमित रास्ते ही बचे थे। या तो ये किसी महाशक्ति के साथ मिल कर अपना विकास करते, अपने संसाधनों का दोहन कर अपनी उन्नति के रास्ते खोजते या अपना एक संगठन बना कर इन महाशक्तियों का सामना व अपना विकास करते। इन देशों ने आख़िरी रास्ते को चुना। दक्षिण एशिया के अधिकतर देश विकासशील हैं, जो अभी पूरी तरह से विकसित नहीं हुए हैं। दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन जिसे 'दक्षेस' के नाम से जाना जाता है। इसे अंग्रेजी में 'साउथ एशियन असोसिएशन फ़ॉर रीजनल कॉर्पोरेशन(सार्क) कहा जाता है। वर्तमान में इस संगठन की कुल सदस्य संख्या 8 है। इस संगठन के महासचिव अमज़द हुसैन बी. सियात(पाकिस्तान) है। यह संगठन विश्व आबादी के 21 प्रतिशत जनसंख्या का प्रतिनिधित्व करता है। इसका सचिवालय नेपाल की राजधानी काठमांडू है।


सार्क में शामिल देश

1. भारत
2. पाकिस्तान
3. बांग्लादेश
4. भूटान
5. नेपाल
6. मालदीव
7. श्रीलंका
8. अफगानिस्तान(सन् 2007 में इस संगठन का हिस्सा बना)

सार्क का प्रमुख उद्देश्य

1. सार्क में शामिल देशों की जनता का जनकल्याण व जीवन स्तर में सुधार करना।

2. सामूहिक आत्मनिर्भरता का विकास करना।

3. दक्षेस में शामिल देशों के मध्य आर्थिक विकास, सामाजिक प्रगति और सांस्कृतिक गति को तेज़ करना।

4. विकास के सामाजिक, वैज्ञानिक आदि क्षेत्रों में पारस्परिक सहयोग करना।

5. अंतर्राष्ट्रीय मंचो पर एक-दूसरे का सहयोग करना।

6. संगठन में शामिल देशों के बीच समस्याओ का निदान, आपसी बातचीत व सहयोगपूर्ण तरीके से करना।

7. अपना क्षेत्र विस्तार करना।


साफ्टा (SAFTA)

'दक्षिण एशियाई मुक्त व्यापार-क्षेत्र समझौता', दक्षेस देशों ने मिलकर सन् 2002 में इसकी नींव रखी और यह सन् 2006 से प्रभावी हो गया। इस समझौते का मुख्य लक्ष्य इन देशों के मध्य आपसी व्यापार में लगने वाले शुल्क कर को कम करना था। इसका लक्ष्य आपसी व्यापार और आर्थिक विकास को बढ़ाना था, लेकिन विश्वाश में कमी और आपसी तालमेल न होने से यह समझौता विफल साबित हुआ। संगठन में शामिल देशों का कहना है कि इस समझौते के जरिए भारत उनके बाज़ार में सेंध मारना चाहता है।

वर्तमान में दक्षेस

इस संगठन की भूमिका को लेकर हमेशा सवाल उठते रहते हैं। भारत-पाकिस्तान के आपसी टकराव के चलते यह संगठन उतना प्रासंगिक नहीं है। इस संगठन की असफलता का प्रमुख कारण शामिल देशों का एक दूसरे के प्रति विश्वास और आपसी तालमेल की कमी है। इसके चलते ये संगठन अपने उद्देश्य को हासिल करने में काफी हद तक असफल रहा है। पर समय-समय पर यह संगठन अपने होने का संकेत देता रहता है। हाल ही में भारतीय प्रधानमंत्री ने COVID-19 की चुनौती से निपटने के लिये सार्क(SAARC) देशों के राष्ट्राध्यक्षों के साथ वीडियो-कॉन्फ्रेंस के जरिए एक बैठक का आयोजन किया था। सार्क देशों ने 15 मार्च, 2020 को हुई मीटिंग में कोरोना वायरस का मिलकर मुकाबला करने का निर्णय किया। इस संबंध में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 1 करोड़ डॉलर की प्रारंभिक पेशकश करते हुए कोविड-19 आपात कोष सृजित करने का प्रस्ताव दिया। उन्होंने अपने वक्तव्य में कहा कि हम साथ मिलकर कोरोना महामारी से निपटेंगे। यह संगठन विश्व के अन्य संगठन को टक्कर दे सकता है बस जरूरत है तो एक-दूसरे पर विश्वास करने की और साथ ही टकराव के मुद्दों को बातचीत के माध्यम से निपटाने की।

टिप्पणी पोस्ट करें

0 टिप्पणियां