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भारत नेपाल विवाद

भारत-नेपाल-विवाद
नेपाल झंडा

भारत और नेपाल के बीच लंबे समय से लिपुलेख, लिम्पियाधुरा और कालापानी क्षेत्र को लेकर विवाद चल रहा है। इस विवाद की जड़ क्या है? विवाद किन कारणों के चलते शुरू हुआ? आगे क्या सम्भावना दिखती है? आइए जानते हैं-


विवाद की जड़

विवाद तीन जगहों को लेकर है - लिपुलेख, कालापानी और लिम्पियाधुरा। ब्रिटिश राज में 1816 में सुगौली संधि के अंतर्गत नेपाल की पूर्वी सीमा महाकाली नदीं के आधार पर तय की गई। नदी का पश्चिमी हिस्सा भारत का और पूर्वी हिस्सा नेपाल का। आगे चलकर नदी चाइना बॉर्डर के पास दो भागों में बट जाती है। पूर्वी भाग मुख्य नदी और पश्चिमी भाग से नदी की एक धारा कटती है। ब्रिटिश सम्राज्य ने इस जगह पर नेपाल की सीमा पश्चिमी यानी की मुख्य नदी से तय की। बाद में ब्रिटिश सत्ता ने 1860 में एक नया नक्शा निकाला। इसके अंतर्गत उसने पूवी धारा वाली महाकाली नदी को अपना बॉर्डर बताया। इन दोनों धाराओं के बीच कोई रहता नहीं था। एक कच्ची सड़क गुजरती थी। जो कि कैलाश मानसरोवर तीर्थ यात्रियों के उपयोग में आती थी। इस कारण नेपाल ने उस दौरान इसे लेकर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी।

तब से लेकर 1947 तक यही नक्शा चला। नेपाल में 1990 तक राजशाही शासन था। इस दौरान भी नक्शे को लेकर नेपाल ने कोई आपत्ति नहीं जताई। इसके बाद 1990 में राजशाही के अंत के बाद नेपाल में लोकतंत्र आता है। ततपश्चात नेपाल ने अपने ऐतिहासिक स्रोत खंगालने शुरू किये। यहीं से इस विवाद की शुरुवात होती है। इसके बाद इस क्षेत्र में कई फील्ड सर्वे कराए गए। लेकिन इसका कोई ठोस निष्कर्ष नहीं निकला।


विवाद को हवा देने वाले कारक


1 नवंबर 2019 में भारत सरकार ने नया नक्शा जारी किया। इसमें काला पानी का क्षेत्र भारत में बताया गया। इसे लेकर नेपाल ने असंतुष्टि जताई।

2 भारत ने कैलाश मानसरोवर यात्रा को आसान बनाने के लिए लिपुलेख तक सड़क का निर्माण किया। इसका उद्घाटन मई 2020 में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने किया। उद्घाटन के फौरन बाद ही नेपाल ने  दावा किया कि भारत द्वार निर्मित सड़क उसके अधिकार क्षेत्र में आती है।

3 पिछले कुछ समय से नेपाल में चीन का प्रभाव बढ़ रहा है। कुछ महीने पहले नेपाल की कम्युनिस्ट पार्टी में उथल पुथल तेज हो गयी थी। ओली सरकार का गिरना लगभग तय था। ऐसे में नेपाल की चीनी अम्बेसडर हूं यांकी ने ओली सरकार को गिरने से बचाया। तभी से के.पी ओली भारत के विरुद्ध बोल रहें हैं।

4 2015 में भारत और चाइना ने एक ट्रेड एग्रीमेंट साइन किया गया। इस एग्रीमेंट के तहत लिपुलेख पास को ट्रेड रुट के रूप में इस्तेमाल करना था। इसे लेकर 2015 में नेपाल के तत्कालीन प्रधानमंत्री ने इसका खुल कर विरोध किया था।


आगे क्या सम्भावना दिखती है?

भारत और नेपाल सांस्कृतिक और ऐतिहासिक दृष्टि से काफी करीब हैं। दोनों देशों के बीच किसी भी प्रकार का वीजा नहीं लगता। मित्रता संधि के अंतर्गत दोनों देशों के लोग बिना किसी रोक के एक दुसरे के देश में आ - जा सकते हैं। पिछले कुछ समय से नेपाल में चीन की उपस्तिथि बढ़ी है। चीन व्यवहारिक तौर पर नेपाल की अर्थव्यवस्था, राजनीति और कूटनीति में प्रवेश कर रहा है। यही एक बड़ा कारण है, जिसके चलते हमारा और नेपाल का रिश्ता दिनों दिन बिगड़ रहा है।
बात अगर लिपुलेख, लिम्पियाधुरा और कालापानी की करें तो इस मुद्दे पर दोनों देशों को साथ बैठकर हल निकलना चाहिए। एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप करने से मामला सुलझेगा नहीं बल्कि और ज्यादा बिगड़ेगा।


भारत और नेपाल के बीच सहयोग

भारत और नेपाल लंबे समय से एक दूसरे के प्रति सहयोग बढाते आएं हैं। भारतीय सेना में हर साल नेपाल से सैकड़ों युवा गोरखा रेजिमेंट में आते हैं। भारत, नेपाल का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है। दोनों देशों के बीच मुक्त व्यापार और सेवाओं का प्रवाह होता है। पर्यटन क्षेत्र में नेपाल को भारत से काफी लाभ पहुंचता है। भारत के रकसौल को नेपाल के काठमांडू से जोड़ने के लिए इलेक्ट्रिक रेल ट्रैक बिछाया जा रहा है।

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