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वन सन, वन वर्ल्ड एंड वन ग्रिड (OSOWOG)

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सोलर पैनल

भारत सरकार ने सौर ऊर्जा को लेकर एक नई मूहिम "वन सन, वन वर्ल्ड एंड वन ग्रिड" (OSOWOG) की शुरुवात की है। सरकार की यह पहल आने वाले भविष्य में देश को एक नई गति और एक नई दिशा देने का काम करेगी। आइए जानते हैं -


क्या है ओसोवोग? (OSOWOG)

यह भारत की एक महत्वाकांक्षी परियोजना है। इसके तहत एक ऐसी ट्रांस नेशनल इलेक्ट्रिसिटी ग्रिड बनाई जाएगी, जिसके तहत भारत विश्व के कई देशों को सौर ऊर्जा का निर्यात करेगा। इस परियोजना के तहत समुद्र के नीचे केबल बिछाए जाएंगे और उन केबल्स के जरिये ऊर्जा का निर्यात दूसरे देशों में किया जाएगा। यह काफी बड़ी परियोजना है। इसको अंजाम देने में दस से बीस साल का वक़्त लगेगा। इस परियोजना में बिलियन्स डॉलर का निवेश होगा। केवल भारत और अफ्रीका महाद्वीप को जोड़ने के लिए 35 से 40 बिलियन्स डॉलर का खर्चा आ सकता है।

मिनिस्ट्री ऑफ न्यू एंड रिन्यूएबल एनर्जी के ड्राफ्ट की माने तो आने वाले समय में भारत इसके जरिये 140 देशों को जोड़ेगा। मिनिस्ट्री ने इस आइडिया को साकार रूप देने की शुरुवात कर दी है। इसके लिए वह कई विशेषज्ञों की मदद ले रही है। "द सन नेवर सेट्स" अर्थात सूर्य कभी अस्त नहीं होता ओसोओग का थीम है।

ड्राफ्ट के मुताबिक हम दुनिया को दो जोन में बाटेंगे - ईस्ट जोन और वेस्ट जोन। ईस्ट में म्यांमार, कंबोडिया, लाओस, वियतनाम आदि देशों को इसके तहत जोड़ने की कोशिश की जाएगी। वहीं वेस्ट जोन में मिडिल ईस्ट, अफ्रीका और यूरोप के कई देशों को इस परियोजना से जोड़ने का प्रयास किया जाएगा।

सौर ऊर्जा को मिडिल ईस्ट और अफ्रीका के कई देश उत्पादित कर सकते हैं। पर भारत को यहां एक एडवांटेज मिलता है। वह यह है कि भारत एक बहुत बड़ी अर्थव्यवस्था है। अफ्रीका और मिडिल ईस्ट देशों की अपेक्षा भारत इस क्षेत्र में ज्यादा निवेश कर सकता है। इस परियोजना को तीन चरण में पूरा किया जाएगा। पहले चरण में हम मिडिल ईस्ट, आसियान और साउथ एशिया के देशों को जोड़ेंगे। दूसरे चरण में हम अफ्रीका के देशों को ओसोवोग से जोड़ेंगे। वहीं तीसरे चरण में यूरोप के देशों को इससे जोड़ा जाएगा। 


यूरोप और अफ्रीका बन सकते हैं बड़े बाजार

इस परियोजना के अंतर्गत भारत के लिए यूरोप, अफ्रीका और आसियान के कई देश एक बड़ी मार्केट बन सकते हैं। गौरतलब बात है कि यूरोप के देश स्वीडन, फ़िनलैंड, नॉर्वे, यूनाइटेड किंगडम आदि में हमेशा ठंड का माहौल बना रहता है। इस कारण वहां पर सौर ऊर्जा को उतपन्न करना काफी मुश्किल भरा कार्य है। वहीं अफ्रीका महाद्वीप के बीच से भूमध्य रेखा गुजरती है। यहां पर सूर्य ऊर्जा का वृहत्तर स्तर पर इस्तेमाल में लाया जा सकता है। पर ग्रह युद्ध और खराब शासन व्यवस्था के चलते अफ्रीका के ज्यादातर देश तंग हाली से गुजर रहें हैं। वहीं तीसरी ओर आसियान देश इस ओर एक बड़ा बाजार बन सकते हैं। इस रूप में यूरोप, मिडिल ईस्ट के देश, अफ्रीका और आसियान के कई देशों को हम ऊर्जा की पूर्ति कर सकेंगे।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पिछले कुछ सालों से अपने भाषणों में 'वन सन, वन वर्ल्ड और वन ग्रिड' की चर्चा करते आ रहें हैं। इस दौरान उन्होंने कई बार कहा है कि "भारत सौर ऊर्जा के क्षेत्र में पूरी दुनिया को प्रेरित कर रहा है। वहीं अक्षय (रिन्यूएबल) ऊर्जा के क्षेत्र में भारत टॉप पांच देशों में अपनी जगह बना चुका है।


भारत का भविष्य होगा ओसोवोग

ओसओग से भारत की पहुँच मिडिल ईस्ट, अफ्रीका और साउथ एशिया के कई देशों के बीच बढ़ेगी। इस कारण वह रणनीतिक और कूटनीतिक ढंग से चीन के बढ़ते प्रभाव को रोक सकेगा। 

भारत मौजूदा वक़्त में सलाना 250 बिलियन डॉलर्स के फॉसिल फ्यूल्स दुनिया से आयात करता है। ओसोओग के आने से हम अक्षय ऊर्जा की ओर बढ़ेंगे। आयात करने वाले फॉसिल फ्यूल्स में कमी आएगी। इस कारण हमारे देश के व्यापार घाटे (Trade deficit) में गिरावट देखने को मिलेगा।

भारत में प्रदूषण की बहुत समस्या है। सलाना हजारों लोग और पशु पक्षियों को इसके चलते अपनी जान गवानी पड़ती है। ओसोओग के आने से हमे स्वच्छ और साफ ऊर्जा मिलेगी। प्रदूषण का दायरे में कमी आएगी। जैव विविधता के हास कम होगा।

ओसोओग के आने से ऊर्जा के क्षेत्र में भारत की निर्भरता दूसरे देशों पर कम होगी। वह ऊर्जा का बड़े पैमाने पर खपत करने के साथ साथ उसका दूसरे देशों में निर्यात कर सकेगा। इससे देश की अर्थव्यवस्था में विदेशी मुद्रा का भंडार बढ़ेगा। नए रोजगार के साधन देश में खुलेंगे।

ओसोओग परियोजना जलवायु परिवर्तन, नवीकरणीय ऊर्जा जैसे मूद्दो पर भारत को अंतरराष्ट्रीय नेतृत्व करने का अवसर प्रदान करेगी।

भारत के ऐसे कई गाँव हैं। जहां आज भी बिजली की बहुत किल्लत है। ऐसी जगहों पर एक दिन में औसतन 12 से 15 घण्टे बिजली की कटौती होती है। ओसोओग परियोजना आने से भारत के सीमांत और पिछड़े इलाकों में बिजली की पहुंच और ठहराव बढ़ेगी। 


चुनौतियां

बड़ी परियोजना है। इसमें लाखों करोड़ का निवेश लगेगा। देश की अर्थव्यवस्था पर कुछ समय अंतराल के लिए छोटे पैमाने पर इसका नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। वहीं दूसरी ओर इससे लोहा, सीमेंट, इस्पात और सोलर पैनल के उद्योग लाभान्वित होंगे। इसके चलते इस क्षेत्र में रोजगार के नए अवसर खुलेंगे।

मिडिल ईस्ट से जुड़ने के लिए पाकिस्तान एक बहुत बड़ा सहायक देश साबित हो सकता था। पर पाकिस्तान के साथ लंबे समय से हमारे रिश्ते खराब चल रहें हैं। इस कारण भारत ने समुद्र के रास्ते मध्य पूर्व के साथ जुड़ने का निर्णय लिया है। इस परियोजना में हमने किसी भी स्तर पर पाकिस्तान को जगह नहीं दी है।

अफ्रीका के कई देशों में चीन का प्रभाव है। बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव के तहत, चीन ने अफ्रीका के कई देशों को बड़े बड़े कर्ज देकर उनके बंदरगाहों को लीज पर ले रखा है। उनकी राजनीतिक व्यवस्था को प्रभावित कर रहा है। इस कारण निकट भविष्य में भारत का ओसोओग परियोजना के तहत अफ्रीकी देशों के साथ जुड़ने में कुछ दिक्कतें आ सकती हैं।

ऑस्ट्रेलिया भी इसी दिशा में काम कर रहा है। एक रिपोर्ट के मुताबिक 2027 तक वह इसको पूरा कर लेगा। वह अपनी परियोजना के साथ आसियान देशों को जोड़ना चाहता है। वहीं भारत का भी लक्ष्य यही है। आने वाले दौर में इसको लेकर एक संघर्ष देखने को मिल सकता है। अभी भारत और ऑस्ट्रेलिया के रिश्ते काफी अच्छे हैं। शायद निकट भविष्य में दोनों देश मिल कर इस विषय पर कोई ठोस हल निकाल लें।

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