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'द सोशल डिलेमा', सोशल मीडिया का है एडिक्शन, तो हो जाइए सावधान!

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द सोशल डिलेमा

क्या हो अगर आने वाले बीस साल में दुनिया खत्म हो जाए? या फिर हमें 10 साल के भीतर विश्व के बड़े लोकतांत्रिक देशों में युद्ध देखने को मिले। हैरान मत होइए! सोशल मीडिया के प्रभाव में आज जो हो रहा है। उसी की सम्भावित तस्वीर बयां करती है नेटफ्लिक्स की लोकप्रिय डॉक्यूमेंट्री द सोशल डाइलेमा। डॉक्यूमेंट्री में उन लोगों के मतों को दिखाया गया है, जिन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स इंस्टाग्राम, फेसबुक, गूगल, पीइंटरेस्ट, ट्विटर आदि को बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

विगत दस वर्षों के दौरान हमारी निर्भरता सोशल मीडिया पर बढ़ी है। इसमें कोई शक नहीं कि सूचना युग में सोशल मीडिया ने समाज को सुभीता प्रदान की। वहीं दूसरी ओर इसका एक डार्क पहलू भी है। जिस पर शायद ही हमने ज्यादा जिक्र किया हो।

आपकी साइकोलॉजी के साथ खेला जा रहा है

विश्व की आधी आबादी सोशल मीडिया का नियमित प्रयोग करती है। इस कारण फेसबुक, अमेज़न और गूगल जैसी बड़ी वेबसाइटों के पास लगभग हर एक यूजर्स का भारी भरकम डेटा उनके सर्वर रूम्स में कैद है। आप अपने मोबाइल में जो कुछ भी कर रहें हैं, उसकी पल पल की मोनिटरिंग हो रही है। आपको आपसे ज्यादा बेहतर सोशल मीडिया के अल्गोरिदम समझ रहे हैं। उसको आपकी पसंद और नापसंद सबका अंदाजा है। और इसी के जरिये वह आपके भावनात्मक पक्ष के साथ खेल कर रहा है। और ये सब बड़ी बड़ी मसीनों और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के सहारे हो रहा है। आपके मेंटल स्टेट को ट्रिगर करके सोशल मीडिया अपने निश्चित उद्देश्यों की पूर्ति कर रहा है। ये उद्देश्य क्या हैं? इसकी ज्यादा जानकारी जानने के लिए आप कैंब्रिज एनालीटिका का केस पढ़ सकते हैं कि कैसे बड़े बड़े सत्ताधारी दलों ने फेसबुक जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल कर एलेक्शन्स को मेनूपुलेट कर अपने निश्चित उद्देश्यों की पूर्ति की? कॉर्पोरेट क्या चाहता है? उसकी इच्छाओं के अनुसार लोगों को ढाला जा रहा है। एजेंडा और प्रोपोगेंडा को कॉर्पोरेट और राजनीतिक दलों की सुविधा के अनुसार फैलाया जा रहा है। 

समाज का ध्रुवीकरण कर रहा है

आप एक न्यूट्रल इंसान है। आपको राइट विंग या लेफ्ट विंग से कोई लेना देना नहीं। स्क्रीन स्क्रॉल करते वक़्त राइट विंग से जुड़ी प्रभावात्मक वीडियो आपके फेसबुक या यूट्यूब स्क्रीन पर एक अच्छे थंबनेल के साथ आ गई। आकर्षित होकर आपने थोड़ी देर उसे देखा। अब ऍप्लिकेशन्स के अल्गोरिदम आपको राइट विंग से जुड़ी वीडियोज ही दिखायेगा। और वही कंटेंट आपके समक्ष इन अल्गोरिदम द्वारा पेश किये जाएंगे, जिनकी प्रभावशीलता अधिक होगी। हाँ लेकिन वह पोस्ट या वीडियो कितनी प्रामाणिक है। इसकी कोई गारंटी नहीं होगी। इस कारण आप एक प्रोपगेंडा के शिकार हो जाएंगे। सूचना या किसी घटना का दूसरा पहलू आपको पता नहीं चलेगा। और आज जो ये बड़ा विभेद जन्म लिया है। वह इसी कारण है। सोशल मीडिया ने हर एक यूजर्स के लिए सूचनाओं का अलग-अलग यूनिवर्स गढ़ दिया है। इनमें एक ही सूचना के विभिन्न नैरेटिव और मनगढ़ंत झूंठी कहानियां यूजर्स के समानांतर तैर रहीं हैं। बड़े स्तर पर ये विभेद दो खंडों में विभाजित किया जा सकता है। और यही एक बड़ा कारण है जिसके चलते आज एक ही मुद्दों पर दो पक्ष लड़ने भिड़ने के लिए तैयार है। गलती दोनों में से किसी की नहीं है। सोशल मीडिया ने दोनों को विचारधारा को एक घेरे में बांध दिया है। यूजर्स के स्क्रीन पर केवल वही सूचनाएं, धारणाएं और प्रोपगेंडा तैर रहा है, जिन्हें वह ज्यादा देखते और सुनते हैं। इस कारण चीजों को लेकर एक बेहतर समझ दोनों ही पक्षों को नही हो पा रही है। और एक बड़ा ध्रुवीकरण हमें समाज में देखने को मिल रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर ऐसा ही चलता रहा तो आने वाले दस सालों के दौरान कई देशों में सिविल वार तक हो सकते हैं। जातिगत और धार्मिक आधार पर फेक वीडियोज बना कर लोगों की धारणाओं को गलत दिशा दी जा रही है। 

बकौल डॉक्यूमेंट्री फेक न्यूज किसी रियल न्यूज की अपेक्षा छः गुना तेजी से  फैलती है। इससे स्पष्ट होता है कि फेक न्यूज का संसार आज कितना बड़ा हो चुका है। इस कारण हम पोस्ट ट्रुथ के भीतर पहले की अपेक्षा ज्यादा सघनता के साथ प्रवेश कर रहें हैं। 

यही नहीं सोशल मीडिया आपके लिए काफी ज्यादा खतरनाक साबित हो रहा है। आपने किसी कारणवस डिप्रेशन से गुजर रहें हैं। इन परिस्थितियों के बीच आपने सोशल साइट पर कुछ डिप्रेशन से जुड़ा कंटेंट देखा। तो यह आपको उसी के समान कई और कंटेंट दिखाता चला जाएगा। देखते देखते आपको पता भी नहीं चलेगा कि आप कितने गहरे उसमे उतर गए हैं। इस कारण आपका मेंटल स्टेट और भी ज्यादा डिप्रेस्ड होगा। यही एक बड़ी वजह है, जिसके चलते आधुनिक दौर में बहुत लोग डिप्रेशन से गुजर रहें हैं। एक रिपोर्ट की माने तो 2009 के बाद से आत्महत्या करने की दर में रिकॉर्ड उछाल देखने को मिला है। और इन सब का सबसे बड़ा कारण सोशल मीडिया ही है।

मोरल इथिक्स टूट रहें हैं

डॉक्यूमेंट्री बताती है कि किस प्रकार सोशल मीडिया ने हमारे वास्तविक जीवन के मोरल इथिक्स को तोड़ा है। लाइक्स और कमेंट्स के जरिये हम एक दूसरे की सुंदरता की तुलना कर रहें हैं। फोटो फिल्टर्स जैसे फीचर्स ने युवा वर्ग के बीच एक बड़े विभेद को जन्म दिया है। उनके बीच एक दूसरे को बढ़ चढ़ कर दिखाने की जदोजहद चल रही है। परिणामस्वरूप वे अपने पर्सनालिटी को कमतर आंक रहें हैं। इस कारण आज का युवा पहले से ज्यादा उदास और दुखी हैं। 2009 के बाद से आत्महत्याओं की दर में जो रिकॉर्ड उछाल देखने को मिला है , उसकी सबसे बड़ी वजह यही है।

गौरतलब बात है कि ये सब मशीन लर्निंग और अर्टिफिसियल द्वारा किया जा रहा है। और हैरान करने वाली बात यह है कि जिन लोगों ने ये सिस्टम बनाया है। उन्हें खुद भी नहीं पता कि ये अंदर ही अंदर कैसे वर्क कर रहा है। 

कलाकार

स्काइलर जिसोन्दो, कारा हेवार्ड, सोफिया हैमन्स

निर्देशक

जेफ ओर्लवस्की

आईएमडीबी रेटिंग्स

7.7


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